दावा: विपक्षी कांग्रेस ने महंगाई पर मोदी सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि उसने अनुकूल अंतरराष्ट्रीय माहौल के बावजूद महंगाई को रोकने के लिए कुछ नहीं किया.
फ़ैसला: महंगाई दर यानि माल या सेवाओं के दाम में बढ़ोत्तरी का दर. पूर्व सरकार के मुक़ाबले ये सरकार महंगाई दर कम रखने में कामयाब रही है. इसका कारण है साल 2014 के बाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दाम में कमी और गांव के लोगों की आमदनी में गिरावट.
पिछले साल राजस्थान में कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा था कि भाजपा महंगाई क़ाबू करने के दावे पर सत्ता में आई थी लेकिन अनुकूल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद सरकार ने कुछ नहीं किया.
इससे पहले साल 2017 में कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी ने महंगाई पर सरकार पर हमला बोला था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा था कि या तो वो महंगाई पर नकेल कसें या "गद्दी छोड़ दें".
उधर प्रधानमंत्री मोदी कहते रहे हैं कि भारत में महंगाई दर दशकों में अब अपने न्यूनतम स्तर पर है.
साल 2014 के चुनाव घोषणा पत्र में भाजपा ने महंगाई को क़ाबू में रखने का वायदा किया था.
उसी साल एक सरकारी समिति ने सिफ़ारिश की थी कि महंगाई दर चार प्रतिशत या इस आंकड़े से प्वाइंट दो प्रतिशत इधर-उधर हो. इसे फ़्लेक्सिबल इन्फ़्लेशन टार्गेटिंग कहा जाता है.
तो कौन सही है?
साल 2010 में जब केंद्र में कांग्रेस सरकार थी तब महंगाई दर क़रीब 12 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा साल 2014 में सत्ता में आई. इस सरकार के कार्यकाल में महंगाई दर बेहद कम रही है.
साल 2017 में औसत महंगाई दर तीन प्रतिशत से थोड़ा ही ज़्यादा थी.
भारत जैसे विशाल और विविध देश में महंगाई दर का पता लगाना बेहद मुश्किल है.
महंगाई दर जानने के लिए अधिकारी थोक बाज़ार पर नज़र रखते हैं लेकिन साल 2014 में केंद्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानि सीपीआई का इस्तेमाल तय किया.
सीपीआई यानि घरों में खपत होने वाले सामान और सेवाओं का दाम, या आसान भाषा में कहें रीटेल प्राइसेज़.
सीपीआई का आधार एक सर्वे होता है जिसमें सामान और सेवाओं पर आंकड़े जुटाए जाते हैं.
इस सर्वे में खाद्य के अलावा दूसरी बातों जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी जानकारी जुटाई जाती है.
ऐसा दूसरे देशों में भी किया जाता है, हालांकि सामान की संख्या, सीपीआई के आंकलन का तरीक़ा अलग होता है.
जानकारों के मुताबिक़ घटती महंगाई दर के पीछे सबसे बड़ा कारण है तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम में लगातार होती कमी.
भारत अपनी तेल की ज़रूरत का 80 प्रतिशत आयात करता है. तेल के दाम में उथल-पुथल का असर महंगाई दर पर पड़ता है.
साल 2011 में जब कांग्रेस सत्ता में थी तब कच्चे तेल का दाम $120 (£90) प्रति बैरल था.
अप्रेल 2016 तक आते-आते कच्चे तेल का दाम $40 प्रति बैरल तक पहुंच गया, हालांकि अगले दो सालों में इसमें एक बार फिर उछाल दर्ज किया गया.
लेकिन अर्थव्यवस्था के दूसरे पहलू भी हैं जिनका महंगाई दर पर असर पड़ता है.
एक महत्वपूर्ण कारण है खाद्य सामान के घटते दाम, ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों में.
यहां ये याद रखना ज़रूरी है कि भारत के 60 प्रतिशत से ज़्यादा लोग ग्रामीण इलाक़ों में रहते हैं.
भारत के पूर्व प्रमुख स्टैटिशियन प्रनब सेन के मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में खेती से होने वाली कमाई में कमी भी महंगाई दर में गिरावट का कारण है.
प्रनब सेन कहते हैं, "पिछले आठ से दस सालों के (कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के) शासनकाल में ग्रामीण रोज़गार योजनाओं के कारण लोगों की कमाई में बढ़ोत्तरी हुई थी, जिससे खाद्य सामान पर ख़र्च में भी तेज़ी आई थी."
Monday, February 25, 2019
Wednesday, February 20, 2019
चुनाव से पहले ट्रिपल तलाक पर फिर अध्यादेश लायी मोदी सरकार-पांच बड़ी खबरें
मंगलवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन तलाक से जुड़े अध्यादेश को एक बार फ़िर मंज़ूरी दे दी है. जिसमें तलाक-ए-बिद्दत को दंडनीय अपराध माना गया है.
लोकसभा में तीन तलाक बिल के पास होने के बाद ये बिल राज्य सभा में पास नहीं हो सका था और 16वीं लोकसभा के आखिरी सत्र के खत्म होने के साथ ही समाप्त हो गया था.
सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया, '' ये अध्यादेश मुसलमान महिलाओं के हकों की रक्षा करेगा.ये तलाक-ए-बिद्दत की इस प्रथा को रोकेगा, जिसमें एक ही बार में पुरूष महिलाओं को तलाक दे देते हैं.''
अमरीकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा हमले को 'भयानक वाकया' बताया.
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, '' मुझे इस हमले से जुड़ी कई रिपोर्ट मिली हैं. ये बेहद भयानक वाकया है. हम इस पर जल्द बयान जारी करेंगे. मैं चाहता हूं कि दोनों एशियाई पड़ोसी देश (भारत-पाकिस्तान) अपने मसले सुलझा लें.''
एक अन्य प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत के साथ अमरीका की बातचीत जारी है. हम ना सिर्फ़ इस घटना की निंदा करते हैं बल्कि भारत के साथ मजबूती से खड़े हैं.
2019 लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा तेज़ी से चढ़ रहा है और इसी कड़ी में मंगलवार को बीजेपी और तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी एआईएडीएमके ने आगामी चुनाव के लिए गठबंधन का ऐलान किया है.
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके इसकी जानकारी दी.
गठबंधन के तहत तमिलनाडु की कुल 39 सीटों में से बीजेपी पांच सीटों पर इस चुनाव लड़ेगी.
इस मौके पर पीयूष गोयल ने कहा, ''हमने एआईएडीएम के साथ आगामी चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है. हमारा गठबंधन तमिलनाडु और पुदुचेरी में एक साथ लड़ेगा. हम राज्य में पन्नीरसेल्वम और पलानीसामी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे और केंद्र में पीएम मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे. सभी 40 सीटों पर एनडीए की जीत होगी''
मंगलवार को केंद्र सरकार ने मंहगाई भत्ते में तीन फ़ीसदी की बढ़ोतरी का ऐलान किया है. महंगाई भत्ता 9 फीसदी से बढ़ाकर 12 फीसदी किया गया है.
एक जनवरी से ये फ़ैसला प्रभावी होगा जिसका लाभ एक करोड़ से ज्यादा सरकारी कर्मचारियों और पेंशन पाने वालों को मिलेगा. इससे सरकारी खजाने पर नौ हज़ार करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ेगा.
महंगाई भत्ता बढ़ने से केंद्र सरकार के 48.41 लाख कर्मचारियों और 62.03 लाख पेंशनभोगियों को फायदा होगा. महंगाई भत्ते की की ये बढ़त सातवें केन्द्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप है.
वेनेज़ुएला की सेना ने एक बार फिर से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के प्रति अपनी निष्ठा ज़ाहिर की है और राष्ट्रपति ट्रंप की विपक्षी नेता ख़्वान गोइदो का साथ देने की मांग को नकार दिया है.
सेना के वरिष्ठ सदस्यों के साथ दिखते हुए रक्षा मंत्री व्लादिमीर पेडरीनो ने कहा है कि नई सरकार थोपने का कोई भी प्रयास मादुरो समर्थकों की लाशों से गुज़रकर ही होगा. उन्होंने कहा कि सेना अमरीका और अन्य देशों की ओर से भेजी गई राहत सामग्री को देश में नहीं घुसने देगी.
लोकसभा में तीन तलाक बिल के पास होने के बाद ये बिल राज्य सभा में पास नहीं हो सका था और 16वीं लोकसभा के आखिरी सत्र के खत्म होने के साथ ही समाप्त हो गया था.
सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया, '' ये अध्यादेश मुसलमान महिलाओं के हकों की रक्षा करेगा.ये तलाक-ए-बिद्दत की इस प्रथा को रोकेगा, जिसमें एक ही बार में पुरूष महिलाओं को तलाक दे देते हैं.''
अमरीकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा हमले को 'भयानक वाकया' बताया.
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, '' मुझे इस हमले से जुड़ी कई रिपोर्ट मिली हैं. ये बेहद भयानक वाकया है. हम इस पर जल्द बयान जारी करेंगे. मैं चाहता हूं कि दोनों एशियाई पड़ोसी देश (भारत-पाकिस्तान) अपने मसले सुलझा लें.''
एक अन्य प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत के साथ अमरीका की बातचीत जारी है. हम ना सिर्फ़ इस घटना की निंदा करते हैं बल्कि भारत के साथ मजबूती से खड़े हैं.
2019 लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा तेज़ी से चढ़ रहा है और इसी कड़ी में मंगलवार को बीजेपी और तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी एआईएडीएमके ने आगामी चुनाव के लिए गठबंधन का ऐलान किया है.
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके इसकी जानकारी दी.
गठबंधन के तहत तमिलनाडु की कुल 39 सीटों में से बीजेपी पांच सीटों पर इस चुनाव लड़ेगी.
इस मौके पर पीयूष गोयल ने कहा, ''हमने एआईएडीएम के साथ आगामी चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है. हमारा गठबंधन तमिलनाडु और पुदुचेरी में एक साथ लड़ेगा. हम राज्य में पन्नीरसेल्वम और पलानीसामी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे और केंद्र में पीएम मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे. सभी 40 सीटों पर एनडीए की जीत होगी''
मंगलवार को केंद्र सरकार ने मंहगाई भत्ते में तीन फ़ीसदी की बढ़ोतरी का ऐलान किया है. महंगाई भत्ता 9 फीसदी से बढ़ाकर 12 फीसदी किया गया है.
एक जनवरी से ये फ़ैसला प्रभावी होगा जिसका लाभ एक करोड़ से ज्यादा सरकारी कर्मचारियों और पेंशन पाने वालों को मिलेगा. इससे सरकारी खजाने पर नौ हज़ार करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ेगा.
महंगाई भत्ता बढ़ने से केंद्र सरकार के 48.41 लाख कर्मचारियों और 62.03 लाख पेंशनभोगियों को फायदा होगा. महंगाई भत्ते की की ये बढ़त सातवें केन्द्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप है.
वेनेज़ुएला की सेना ने एक बार फिर से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के प्रति अपनी निष्ठा ज़ाहिर की है और राष्ट्रपति ट्रंप की विपक्षी नेता ख़्वान गोइदो का साथ देने की मांग को नकार दिया है.
सेना के वरिष्ठ सदस्यों के साथ दिखते हुए रक्षा मंत्री व्लादिमीर पेडरीनो ने कहा है कि नई सरकार थोपने का कोई भी प्रयास मादुरो समर्थकों की लाशों से गुज़रकर ही होगा. उन्होंने कहा कि सेना अमरीका और अन्य देशों की ओर से भेजी गई राहत सामग्री को देश में नहीं घुसने देगी.
Wednesday, February 13, 2019
फैसला सुनाने वाले दोनों जज एकमत नहीं, मामला बड़ी बेंच के पास भेजा गया
दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल (एलजी) के बीच अधिकारों की लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को फैसला सुनाया गया। हालांकि, ज्वाइंट सेक्रेटरी लेवल के अधिकारियों के तबादले और नियुक्ति के अधिकार पर बेंच के दोनों जज- एके सीकरी और अशोक भूषण एकमत नहीं थे। ऐसे में यह मामला बड़ी बेंच के पास भेज दिया गया।
जस्टिस सीकरी ने पहले फैसला पढ़ा, एक बिंदु पर जस्टिस भूषण असहमत
ज्वाइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर के अधिकारियों के तबादले-नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार के पास रहेगा। उससे नीचे के अधिकारियों के बारे मे दिल्ली को अधिकार, लेकिन इसके लिए बोर्ड गठित होगा। हालांकि, जस्टिस अशोक भूषण इस फैसले से असहमत थे।
एंटी करप्शन ब्यूरो केंद्र सरकार के पास रहेगा।
सरकारी वकील की नियुक्ति दिल्ली सरकार के पास रहेगी।
कमीशन ऑफ इंक्वायरी केंद्र सरकार के अंतर्गत रहेगी।
दिल्ली में जो जमीन है उसका सर्किल रेट दिल्ली सरकार तय करेगी। इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड दिल्ली सरकार के पास रहेगा।
जब एलजी और मुख्यमंत्री के बीच विवाद होगा तो एलजी की राय मानी जाएगी।
जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण की बेंच ने विभिन्न मुद्दों को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से जारी नोटिफिकेशन्स को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पिछले साल 1 नवंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। 2014 में आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच प्रशासनिक अधिकारों के लिए खींचतान जारी है।
एलजी के पास प्रशासनिक अधिकार: केंद्र
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि दिल्ली में सर्विसेज को संचालित करने का अधिकार एलजी के पास है। साथ ही यह भी कहा था कि शक्तियों को दिल्ली के प्रशासक (एलजी) को सौंप दिया जाता है और सेवाओं को उसके माध्यम से प्रशासित किया जाता है। केंद्र ने यह भी कहा था कि जब तक भारत के राष्ट्रपति स्पष्ट रूप से निर्देश नहीं देते, तब तक एलजी मुख्यमंत्री या मंत्रिपरिषद से परामर्श नहीं कर सकते।
स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं सकते एलजी: सुप्रीम कोर्ट
4 अक्टूबर को दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि वह जानना चाहते हैं कि 4 जुलाई को कोर्ट द्वारा दिल्ली में प्रशासन को लेकर दिए गए फैसले के संदर्भ में उनकी स्थिति क्या है? 4 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन के लिए विस्तृत मापदंडों को निर्धारित किया था।
कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि दिल्ली को एक राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता, लेकिन एलजी की शक्तियों को यह कहते हुए छोड़ दिया गया कि उसके पास स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की शक्ति नहीं है और उसे चुनी गई सरकार की सहायता और सलाह पर काम करना है।
'दिल्ली की असाधारण स्थिति'
पिछले साल 19 सितंबर को केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया था कि दिल्ली के प्रशासन को अकेले दिल्ली सरकार के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता है और देश की राजधानी होने के नाते यह 'असाधारण' स्थिति है। यहां संसद और सुप्रीम कोर्ट जैसे महत्वपूर्ण संस्थान हैं और विदेशी राजनयिक भी यहां रहते हैं। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट रूप से कहा था कि दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
जस्टिस सीकरी ने पहले फैसला पढ़ा, एक बिंदु पर जस्टिस भूषण असहमत
ज्वाइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर के अधिकारियों के तबादले-नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार के पास रहेगा। उससे नीचे के अधिकारियों के बारे मे दिल्ली को अधिकार, लेकिन इसके लिए बोर्ड गठित होगा। हालांकि, जस्टिस अशोक भूषण इस फैसले से असहमत थे।
एंटी करप्शन ब्यूरो केंद्र सरकार के पास रहेगा।
सरकारी वकील की नियुक्ति दिल्ली सरकार के पास रहेगी।
कमीशन ऑफ इंक्वायरी केंद्र सरकार के अंतर्गत रहेगी।
दिल्ली में जो जमीन है उसका सर्किल रेट दिल्ली सरकार तय करेगी। इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड दिल्ली सरकार के पास रहेगा।
जब एलजी और मुख्यमंत्री के बीच विवाद होगा तो एलजी की राय मानी जाएगी।
जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण की बेंच ने विभिन्न मुद्दों को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से जारी नोटिफिकेशन्स को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पिछले साल 1 नवंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। 2014 में आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच प्रशासनिक अधिकारों के लिए खींचतान जारी है।
एलजी के पास प्रशासनिक अधिकार: केंद्र
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि दिल्ली में सर्विसेज को संचालित करने का अधिकार एलजी के पास है। साथ ही यह भी कहा था कि शक्तियों को दिल्ली के प्रशासक (एलजी) को सौंप दिया जाता है और सेवाओं को उसके माध्यम से प्रशासित किया जाता है। केंद्र ने यह भी कहा था कि जब तक भारत के राष्ट्रपति स्पष्ट रूप से निर्देश नहीं देते, तब तक एलजी मुख्यमंत्री या मंत्रिपरिषद से परामर्श नहीं कर सकते।
स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं सकते एलजी: सुप्रीम कोर्ट
4 अक्टूबर को दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि वह जानना चाहते हैं कि 4 जुलाई को कोर्ट द्वारा दिल्ली में प्रशासन को लेकर दिए गए फैसले के संदर्भ में उनकी स्थिति क्या है? 4 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन के लिए विस्तृत मापदंडों को निर्धारित किया था।
कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि दिल्ली को एक राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता, लेकिन एलजी की शक्तियों को यह कहते हुए छोड़ दिया गया कि उसके पास स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की शक्ति नहीं है और उसे चुनी गई सरकार की सहायता और सलाह पर काम करना है।
'दिल्ली की असाधारण स्थिति'
पिछले साल 19 सितंबर को केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया था कि दिल्ली के प्रशासन को अकेले दिल्ली सरकार के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता है और देश की राजधानी होने के नाते यह 'असाधारण' स्थिति है। यहां संसद और सुप्रीम कोर्ट जैसे महत्वपूर्ण संस्थान हैं और विदेशी राजनयिक भी यहां रहते हैं। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट रूप से कहा था कि दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
Wednesday, February 6, 2019
मध्य प्रदेश : 2 मार्च को बच्ची से रेप के दोषी अध्यापक को होगी फांसी?
मध्य प्रदेश के सतना ज़िला एवं सत्र न्यायालय ने अध्यापक महेंद्र सिंह गोंड को चार साल की बच्ची का अपहरण कर रेप करने का दोषी पाते हुए फांसी की सज़ा सुनाई थी. सत्र न्यायालय ने 19 सितंबर 2018 में महेंद्र को फांसी की सज़ा सुनाई थी.
जिसके बाद इस फ़ैसले को अवलोकन के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भेज दिया गया था. हाई कोर्ट ने 25 जनवरी 2019 में सत्र न्यायालय के फ़ैसले पर मुहर लगा दी और अब चार फ़रवरी को सत्र न्यायालय ने फांसी की तारीख़ तय कर दी है.
महेंद्र सिंह गोंड को 2 मार्च के दिन फांसी होनी है.
महेंद्र को जबलपुर जेल में दो मार्च 2019 को फांसी दी जाएगी. महेंद्र सिंह गोंड पर आईपीसी की धारा 376(a)(b) के तहत फ़ैसला सुनाया गया. इसके अलावा उन पर आईपीसी की ही धारा 363 (अपहरण) के तहत भी सुनवाई की गई थी.
बता दें कि कानून 12 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ रेप के मामले में अधिकतम मृत्युदंड का प्रावधान है.
लेकिन क्या ये फांसी हो पाएगी?
ये सवाल कोर्ट के फ़ैसले पर नहीं है. बल्कि उन क़ानूनी दांव-पेचों को लेकर है, जिसकी वजह से इस बात की बहुत आशंका है कि दो मार्च को फ़ांसी न हो.
क्या हैं ये दांव-पेंच?
महेंद्र सिंह गोंड का मामला हो या ऐसा ही कोई भी दूसरा मामला. फैसले के बाद ऐसे मामले में आरोपी सुप्रीम कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में ही समीक्षा याचिका और अंत में राष्ट्रपति के पास जा सकता है.
दिल्ली हाई कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन कहती हैं "अभियुक्त सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (स्पेशल लीव पेटिशन्स) डाल सकता है. अगर सुप्रीम कोर्ट उसे भी ख़ारिज कर दे तो वो समीक्षा याचिका डाल सकता है और इसके बाद वो राष्ट्रपति के पास दया याचिका भी डाल सकता है."
रेबेका कहती हैं कि मृत्युदंड देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट बहुत वक़्त लेता है. ज़्यादातर मामलों में सुप्रीम कोर्ट मृत्यदंड को आजीवन कारावास में तब्दील कर देता है. बहुत कम मामलों में ही सुप्रीम कोर्ट मृत्युदंड देता है.
हालांकि महेंद्र की ओर से अभी तक सुप्रीम कोर्ट में याचिका नहीं डाली गई है लेकिन उनके वकील वी सी राय का कहना है कि वो आने वाले एक-दो दिन में याचिका दायर कर देंगे.
वी सी राय बताते हैं "हालांकि हमने अभी तक याचिका नहीं दायर की है लेकिन जल्दी ही कर देंगे और हमें पूरा यक़ीन है कि सुप्रीम कोर्ट मृत्युदंड के फ़ैसले पर रोक लगा देगा."
वो कहते हैं "मुझे पूरा यक़ीन है कि सुप्रीम कोर्ट इस फ़ैसले पर रोक लगा देगा. हम कोर्ट में उस सीसीटीवी फ़ुटेज को भी पेश करेंगे जिसे सत्र न्यायालय और हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया."
लेकिन इस सीसीटीवी फ़ुटेज में है क्या?
इस सवाल के जवाब में वी सी राय कहते हैं कि सीसीटीवी से पता चलता है कि जिस दिन यह घटना हुई, मेरा मुवक्किल जेल में था.
लेकिन जब हमने उनसे इससे जुड़ी और जानकारी मांगी तो वी सी राय ने कहा कि उन्हें सिर्फ़ इतना ही पता है, इससे ज़्यादा नहीं.
वो कहती हैं "ये सही है कि अभियुक्त के पास अभी कुछ मौके हैं लेकिन फांसी की इसमें ज़्यादा से ज़्यादा उम्रकैद में ही तब्दीली की राहत मिलेगी, उससे ज़्यादा नहीं."
बकौल अनुजा, "चूंकि यह पोक्सो का मामला है और बच्ची की उम्र 12 साल से भी कम है तो सुप्रीम कोर्ट इस मामले को बहुत गंभीरता से लेगा. हालांकि वो भी रूबेका की बात का समर्थन करती हैं कि अभी सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के पास जाने का विकल्प है. हालांकि उन्हें इस बात की पूरी उम्मीद है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट मृत्यदंड को ही आगे भी जारी रखेगा."
बच्चों के साथ रेप और क़ानून में संशोधन
बीते साल पॉक्सो यानी (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्डर्न फ्रॉम सेक्सुअल अफेंस एक्ट) में कई संशोधन किए गए. जिसके बाद अब 12 साल तक के बच्चों के साथ यौन अपराध की स्थिति में अपराधी को अधिकतम फांसी की सज़ा सुनाई जा सकती है. ऐसे अपराधियों के लिए कम से कम 20 साल तक की सज़ा का प्रावधान है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने 2015 के जो आंकड़े जारी किए उसमें महिलाओं के ख़िलाफ़ रेप के सबसे अधिक मामले मध्य प्रदेश में ही दर्ज हुए थे. एनसीआरबी के मुताबिक 2015 में देश भर में 34,651 रेप के मामले दर्ज हुए जिनमें सबसे ज्यादा 4,391 मध्य प्रदेश में रिपोर्ट हुए थे जो कुल आंकड़े का क़रीब 12.7 फ़ीसदी था.
संशोधन के बाद बढ़े हैं फ़ांसी की सज़ा के मामले
सज़ा की बात तब आती है जब बलात्कार के मामलों पर फैसला आए. पिछले 10 साल में भारत में बलात्कार के 2 लाख 78 हज़ार से अधिक मामले दर्ज हुए हैं.
इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में बलात्कार के चार में से सिर्फ एक ही मामले में अपराधियों पर दोष साबित हुआ, यानी 75 प्रतिशत मामले में आरोप के घेरे में आए लोग छूट गए. 2007 से लेकर 2016 तक दोष साबित होने की दर 30 फीसदी तक भी नहीं पहुंच पाई है.
जिसके बाद इस फ़ैसले को अवलोकन के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भेज दिया गया था. हाई कोर्ट ने 25 जनवरी 2019 में सत्र न्यायालय के फ़ैसले पर मुहर लगा दी और अब चार फ़रवरी को सत्र न्यायालय ने फांसी की तारीख़ तय कर दी है.
महेंद्र सिंह गोंड को 2 मार्च के दिन फांसी होनी है.
महेंद्र को जबलपुर जेल में दो मार्च 2019 को फांसी दी जाएगी. महेंद्र सिंह गोंड पर आईपीसी की धारा 376(a)(b) के तहत फ़ैसला सुनाया गया. इसके अलावा उन पर आईपीसी की ही धारा 363 (अपहरण) के तहत भी सुनवाई की गई थी.
बता दें कि कानून 12 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ रेप के मामले में अधिकतम मृत्युदंड का प्रावधान है.
लेकिन क्या ये फांसी हो पाएगी?
ये सवाल कोर्ट के फ़ैसले पर नहीं है. बल्कि उन क़ानूनी दांव-पेचों को लेकर है, जिसकी वजह से इस बात की बहुत आशंका है कि दो मार्च को फ़ांसी न हो.
क्या हैं ये दांव-पेंच?
महेंद्र सिंह गोंड का मामला हो या ऐसा ही कोई भी दूसरा मामला. फैसले के बाद ऐसे मामले में आरोपी सुप्रीम कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में ही समीक्षा याचिका और अंत में राष्ट्रपति के पास जा सकता है.
दिल्ली हाई कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन कहती हैं "अभियुक्त सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (स्पेशल लीव पेटिशन्स) डाल सकता है. अगर सुप्रीम कोर्ट उसे भी ख़ारिज कर दे तो वो समीक्षा याचिका डाल सकता है और इसके बाद वो राष्ट्रपति के पास दया याचिका भी डाल सकता है."
रेबेका कहती हैं कि मृत्युदंड देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट बहुत वक़्त लेता है. ज़्यादातर मामलों में सुप्रीम कोर्ट मृत्यदंड को आजीवन कारावास में तब्दील कर देता है. बहुत कम मामलों में ही सुप्रीम कोर्ट मृत्युदंड देता है.
हालांकि महेंद्र की ओर से अभी तक सुप्रीम कोर्ट में याचिका नहीं डाली गई है लेकिन उनके वकील वी सी राय का कहना है कि वो आने वाले एक-दो दिन में याचिका दायर कर देंगे.
वी सी राय बताते हैं "हालांकि हमने अभी तक याचिका नहीं दायर की है लेकिन जल्दी ही कर देंगे और हमें पूरा यक़ीन है कि सुप्रीम कोर्ट मृत्युदंड के फ़ैसले पर रोक लगा देगा."
वो कहते हैं "मुझे पूरा यक़ीन है कि सुप्रीम कोर्ट इस फ़ैसले पर रोक लगा देगा. हम कोर्ट में उस सीसीटीवी फ़ुटेज को भी पेश करेंगे जिसे सत्र न्यायालय और हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया."
लेकिन इस सीसीटीवी फ़ुटेज में है क्या?
इस सवाल के जवाब में वी सी राय कहते हैं कि सीसीटीवी से पता चलता है कि जिस दिन यह घटना हुई, मेरा मुवक्किल जेल में था.
लेकिन जब हमने उनसे इससे जुड़ी और जानकारी मांगी तो वी सी राय ने कहा कि उन्हें सिर्फ़ इतना ही पता है, इससे ज़्यादा नहीं.
वो कहती हैं "ये सही है कि अभियुक्त के पास अभी कुछ मौके हैं लेकिन फांसी की इसमें ज़्यादा से ज़्यादा उम्रकैद में ही तब्दीली की राहत मिलेगी, उससे ज़्यादा नहीं."
बकौल अनुजा, "चूंकि यह पोक्सो का मामला है और बच्ची की उम्र 12 साल से भी कम है तो सुप्रीम कोर्ट इस मामले को बहुत गंभीरता से लेगा. हालांकि वो भी रूबेका की बात का समर्थन करती हैं कि अभी सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के पास जाने का विकल्प है. हालांकि उन्हें इस बात की पूरी उम्मीद है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट मृत्यदंड को ही आगे भी जारी रखेगा."
बच्चों के साथ रेप और क़ानून में संशोधन
बीते साल पॉक्सो यानी (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्डर्न फ्रॉम सेक्सुअल अफेंस एक्ट) में कई संशोधन किए गए. जिसके बाद अब 12 साल तक के बच्चों के साथ यौन अपराध की स्थिति में अपराधी को अधिकतम फांसी की सज़ा सुनाई जा सकती है. ऐसे अपराधियों के लिए कम से कम 20 साल तक की सज़ा का प्रावधान है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने 2015 के जो आंकड़े जारी किए उसमें महिलाओं के ख़िलाफ़ रेप के सबसे अधिक मामले मध्य प्रदेश में ही दर्ज हुए थे. एनसीआरबी के मुताबिक 2015 में देश भर में 34,651 रेप के मामले दर्ज हुए जिनमें सबसे ज्यादा 4,391 मध्य प्रदेश में रिपोर्ट हुए थे जो कुल आंकड़े का क़रीब 12.7 फ़ीसदी था.
संशोधन के बाद बढ़े हैं फ़ांसी की सज़ा के मामले
सज़ा की बात तब आती है जब बलात्कार के मामलों पर फैसला आए. पिछले 10 साल में भारत में बलात्कार के 2 लाख 78 हज़ार से अधिक मामले दर्ज हुए हैं.
इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में बलात्कार के चार में से सिर्फ एक ही मामले में अपराधियों पर दोष साबित हुआ, यानी 75 प्रतिशत मामले में आरोप के घेरे में आए लोग छूट गए. 2007 से लेकर 2016 तक दोष साबित होने की दर 30 फीसदी तक भी नहीं पहुंच पाई है.
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