Monday, April 22, 2019

तकनीक की दुनिया में गोरे मर्दों का बोलबाला क्यों?

नई तकनीक जड़ता को तोड़ती है. इसने इंसान की मानसिकता बदली है. लेकिन जब हम टेक इंडस्ट्री में विविधता के बारे में बातें करते हैं तो सबसे बड़ी बाधा आज के टेक लीडर्स की जड़ मानसिकता के रूप में सामने आती है.

एक सजातीय समूह ने, जिसमें ज़्यादातर गोरे मर्द शामिल थे, टेक इंडस्ट्री की स्थापना की और इसमें पैसे लगाए. शुरुआत से ही उन्होंने ऐसा माहौल बनाया कि जो लोग उनके जैसे दिखते हों उनके क़ामयाब होने की संभावना ज़्यादा रहेगी.

पुरुष निवेशकों के पूर्वाग्रह ने उनको महिला संस्थापकों की कंपनियों में निवेश करने से रोका. गोरे लोगों ने अपने नस्लीय समूह और क्षेत्र से बाहर भी निवेश नहीं किया. यह समस्या आज भी बरकरार है.

पिछले साल अमरीका में उद्यम पूंजी का बड़ा हिस्सा गोरे मर्दों की कंपनियों में लगा. महिला संस्थापकों की कंपनियों में उद्यम पूंजी का सिर्फ़ 9 फीसदी पैसा गया और काले या लैटिन संस्थापकों की कंपनियों में केवल 3 फीसदी निवेश हुआ.

उद्यम पूंजीपतियों में 90 फ़ीसदी गोरे मर्द हैं. इनमें से कई लोग अपने समूह से आगे की दुनिया नहीं देख पाते, जहां दूसरे लोग भी मौजूद हैं. मेट्रिक्स से पता चलता है कि महिलाओं और पिछड़े नस्लीय और जातीय समूह के लोगों को कितना कम टेक फ़ंड मिलता है.

बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) के 2018 के एक अध्ययन के मुताबिक महिला संस्थापकों को उनके पुरुष समकक्षों को मिलने वाली फ़ंड का आधे से भी कम हिस्सा मिलता है. 'डिजिटल अनडिवाइडेड' की प्रोजेक्ट डायने रिपोर्ट में पाया गया कि काली महिला संस्थापकों को औसतन 42 हजार डॉलर का फ़ंड मिला, जबकि औसत फंड 11 लाख डॉलर का है.

'डिजिटल अनडिवाइडेड' ने यह भी हिसाब लगाया है कि पिछले दशक में कुल उद्यम पूंजी का केवल 0.3 फ़ीसदी हिस्सा ही लैटिन अमरीकी महिलाओं को मिला. हाल के अध्ययनों से उस नजरिये की समस्याओं और विविधता के फ़ायदे, दोनों का पता चलता है.

-2015 की मैकिंसे रिपोर्ट में पाया गया कि नस्लीय, जातीय और लैंगिक विविधता वाली कंपनियां बेहतर व्यावसायिक प्रदर्शन करती हैं.

-BCG की रिपोर्ट के मुताबिक महिला संस्थापकों के स्टार्ट-अप्स का वित्तीय प्रदर्शन बेहतर रहा.

-उन्होंने पांच साल में 10 फीसदी ज़्यादा राजस्व (6,62,000 डॉलर की जगह 7,30,000 डॉलर) जुटाया.

-प्रति डॉलर निवेश पर उनका राजस्व भी दोगुने से ज़्यादा (0.31 डॉलर के मुक़ाबले 0.78 डॉलर) रहा.

2012 में मैंने अपने वेंचर कैपिटल फ़र्म क्लेनर पर्किंस पर लैंगिक भेदभाव और कर्मचारी के रूप में मुझसे बदला निकालने का मुकदमा दर्ज कराया था. कंपनी का दावा था कि उसके फ़ैसले प्रदर्शन पर आधारित थे. 2015 में मैं वह मुकदमा हार गई, लेकिन इस मुकदमे ने टेक्नोलॉजी के बारे में लोगों की सोच बदल दी.

कुछ मामलों में, लोग टेक्नोलॉजी के क्षेत्र को कैसे देखते हैं, वह भी बदल गया. तब से अब तक सैकड़ों लोग भेदभाव की कहानियां साझा कर चुके हैं. ये कहानियां नज़रिये और व्यवहार, दोनों को बदल रही हैं. मिसाल के लिए, कई और कंपनियों में महिलाओं को साझीदार के रूप में जोड़ा है. इसने मुझे सिखाया कि बदलाव मुमकिन है, लेकिन यह ऊपर से होना चाहिए.

यदि किसी कंपनी में जूनियर और मिडल लेवल पर ढेरों महिलाएं हों, लेकिन उनको नौकरी पर रखने, निकालने और उनकी तनख़्वाह तय करने का अधिकार पूर्वाग्रही पुरुषों के पास हो तो उद्यम पूंजी और उद्यमशीलता में पुरुषों का वर्चस्व कायम रहेगा.

तकनीक को विविधतापूर्ण और समावेशी बनाने के लिए भविष्य के कारोबारी नेताओं को अपने स्टार्ट-अप्स और कंपनियों से शुरुआत करनी होगी और तीन मूल्यों का ध्यान रखना होगा.

पहला मूल्य है समावेश. 1987 में काली महिलावादी विद्वान किंबरले क्रेंशॉ ने एक शब्द गढ़ा था- intersectionality.

क्रेंशॉ ने बताया था कैसे लिंग और नस्ल जैसी पहचान कई तरीकों से आपस में जुड़ी रहती हैं और जब ये एक-दूसरे से टकराती हैं तो पूर्वाग्रह भारी सामाजिक असमानताओं और भेदभाव का कारण बनता है.

उदाहरण के लिए, काली और लैटिन अमरीकी महिला संस्थापकों के लिए फ़ंड की बाधाएं सामान्य महिलाओं से कहीं ज़्यादा हैं.

दूसरा मूल्य है समझ की व्यापकता. नाममात्र के प्रयासों और नियुक्तियों से काम नहीं चलने वाला. इसकी जगह काम के सभी स्तरों पर और सभी समूहों में विविधता और समावेशिता लानी होगी.

तीसरा मूल्य है जवाबदेही. जब तक तरक्की और खाई को मापने और उनका प्रबंधन करने के लिए मेट्रिक्स का इस्तेमाल नहीं किया जाता तब तक यह जानना मुश्किल है कि असल में कितनी प्रगति हुई है. यह कारोबार की प्राथमिकता में नहीं है.

कंपनी में विविधता बढ़ाने और समावेश के लिए गंभीर किसी भी सीईओ को जनसांख्यिकीय लक्ष्यों और महत्वपूर्ण प्रदर्शन संकेतों को अपनाना चाहिए, जैसा वे कारोबार के दूसरे क्षेत्रों में करते हैं.

पहला कदम जनसांख्यिकी और संतुष्टि के स्तर का सर्वेक्षण करना है जिससे पता चलता है कि समस्याएं कहां हैं. इसके नतीजों का इस्तेमाल बेंचमार्क सेट करने और अवसरों को खोजने के लिए करें. इस प्रक्रिया से काम की चीजें पता चल सकती हैं.

मिसाल के लिए, 'प्रोजेक्ट इनक्लूड' में जब मैंने और मेरे सहयोगियों ने टेक स्टार्ट-अप्स के 2,000 से ज़्यादा कर्मचारियों का सर्वेक्षण किया तो 13 फ़ीसदी ने अपनी पहचान LGBQIA (लेस्बियन, गे, बाय-सेक्शुअल, क्वियर, इंटरसेक्स और एसेक्शुअल) बताई.

पांच फ़ीसदी कर्मचारियों ने ख़ुद नॉन-बायनरी, ट्रांसजेंडर, जेंडरफ्लूड या स्त्री-पुरुष से अलग पहचान वाला बताया. हमने यह भी देखा कि कर्मचारियों के यौन रुझान के सवाल को छोड़ देने की संभावना सबसे ज़्यादा थी. शायद इसकी सबसे बड़ी वजह भेदभाव का डर हो या फिर अपनी निजता को बचाए रखने की इच्छा.

हमने लैंगिक-समावेशी कार्यस्थलों और संस्कृतियों के लिए अपनी सिफ़ारिशों की सूची तैयार कर ली है जिसे इसी साल जारी किया जाएगा. इसमें हमने ऑल-जेंडर बाथरूम बनाने जैसे शुरुआती कदमों से लेकर सभी जेंडर के लिए इलाज और बीमा सुविधाएं देने जैसे प्रभावशाली उपायों को शामिल किया है.

कार्यकारी और बोर्ड-स्तर के पदों पर विविधता से भरे कर्मचारियों की नियुक्ति करने से फ़र्क पड़ता है. नौकरी की तलाश करने वाले कई आवेदक सबसे पहले संभावित नियोक्ता कंपनी की वेबसाइट देखते हैं.

वो पहले कर्मचारियों की विविधता देखते हैं, फिर अपने लिए अवसर तलाश करते हैं. वो बड़े अधिकारियों, सीईओ और बोर्ड सदस्यों को देखते हैं कि किसके पास ताक़त है और कम संख्या वाले समूहों के लोग वहां कितना आगे बढ़ सकते हैं. कई कंपनियों में बोर्ड की सीटें निवेशकों को अनुबंध के जरिये आवंटित की जाती हैं.

उद्यम पूंजी कंपनियों में विविधता न होने से बोर्ड में विविधता नहीं आ पाती जिससे कारोबारी प्रदर्शन भी प्रभावित होता है. इसलिए निवेशक अपनी टीम देखें, अपने पूर्वाग्रहों को देखें और अपने लक्ष्य निर्धारित करें. अगर आप शीर्ष पर विविधता लाते हैं तो पूर्वाग्रहों को ख़त्म करना आसान हो जाएगा.

Tuesday, April 16, 2019

क्या कमल हासन की राजनीति में एंट्री फ़्लॉप शो है?

दक्षिणी तमिलनाडु मे मदुरई के नज़दीक रामनाथपुरम में कमल हासन अपनी नई पार्टी मक्कल नीदि मय्यम (एमएनएम) के स्थानीय उम्मीदवार का प्रचार कर रहे थे. उन्हें सुनने एक भीड़ जमा थी.

मक्कल का अर्थ है 'लोग', नीदि का मतलब है 'जस्टिस या इंसाफ़'. मय्यम का अर्थ 'केंद्र'. यानी एक ऐसी जगह जहां सभी के लिए जगह है, चाहे वो वामपंथी हो या दक्षिणपंथी.

कई फ़िल्म अवार्ड जीत चुके कमल हासन एक रूफ़टॉप गाड़ी से सभी का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे. उनके फ़ैंस मोबाइल पर तस्वीरें ले रहे थे. सड़क के किनारे पार्टी समर्थक कान फाड़ देने वाली आवाज़ में उनकी फ़िल्मों के गाने चला रहे थे.

क्या आप कमल हासन को वोट करेंगे, ये पूछने पर थोड़ी दूर खड़े एक व्यक्ति ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा, मैं कमल हासन का फ़ैन तो हूं, लेकिन न तो वो, न कमल हासन की तस्वीरें और वीडियो उतारने वाले उन्हें वोट करेंगे.

उन्होंने कहा, "भीड़ इकट्ठा होना और वोट देना दो अलग-अलग बाते हैं." ये कहकर वो मुड़े और वहां से चले गए.

कमल हासन और उनकी पार्टी के बारे में मुझे ये बातें कई जगह सुनने को मिलीं- कि वो बेहद ज़हीन सोच रखने वाले कलाकार तो हैं लेकिन राजनीति में बिना पसीना बहाए ट्विटर के भरोसे पार्टी बनाकर चुनाव नहीं जीता जाता.

कुछ लोग इसे एक राजनीतिक प्रयोग मान रहे हैं जिसका इस चुनाव में कोई असर नहीं होगा.

कुछ का तो ख्याल है कि अगर चुनाव में पार्टी अच्छा नहीं कर पाई तो कमल हासन का ये पहला और आख़िरी चुनाव होगा.

64 साल के कमल हासन खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. उनके समर्थक सभी सीटें जीतने का दावा करते हैं. पार्टी ने चुनाव घोषणा पत्र में पानी की समस्या, ग़रीबी हटाने के वायदे किए हैं.

तमिलनाडु की राजनीति में कमल हासन से पहले करुणानिधि, अन्नादुरई, जयललिता, एमजीआर जैसे फ़िल्मी हस्तियों ने डंका बजाया. तो फिर कमल हासन क्यों नहीं?

मद्रास विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर रामू मनिवन्नन कहते हैं, "कमल हासन बेहतरीन कलाकार हैं लेकिन उन्हें खुद को स्थापित करने के लिए ज़मीन पर काम करना होगा. दूसरों को सवालों के कटघरे में खड़ा करके आप राजनेता नहीं बन जाते."

आखिरकार करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता जैसी शख्सियतों को राजनीति में रातों रात सफलता नहीं मिली.

अन्नादुराई और करुणानिधि ने कला और सिनेमा का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक सोच को लोगों तक पहुंचाने के लिए किया. जैसे शिवाजी गणेशन की 'पराशक्ति' जैसी फ़िल्में जिसकी स्क्रिप्ट करुणानिधि ने लिखी.

फ़िल्म में सामाजिक व्यवस्था, ब्राह्मणवाद और जाति व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी की गई थी. भाषा, ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व, सांस्कृति पहचान जैसे विषय द्रविड़ राजनीति के प्रमुख स्तंभ रहे हैं.

एमजीआर भी रातों रात राजनीतिक स्टार नहीं बने. वो पहले कांग्रेस में थे. बाद में डीएमएके में एमएलए, एमएलसी, पार्टी कोषाध्यक्ष के पद पर रहे. यानि सालों की मेहनत के बाद वो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे.

जयललिता को भी राह आसान नहीं रही, खासकर पुरुष प्रधान सिनेमा और राजनीति में. जब वो साल 1984 में राज्यसभा में गईं तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उनके भाषण से प्रभावित हुईं. वो पार्टी की प्रोपागैंडा सेक्रटरी भी रहीं.

उन्होंने तमिलनाडु के कोने-कोने का दौरा किया. एमजीआर की मौत के बाद उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी की लड़ाई में जयललिता ने अपना लोहा मनवाया.

कमल हासन के आलोचक कहते हैं न उन्होंने राजनीति में इंटर्नशिप की, न उसे सीखा, न उसे सीखने के लिए सालों पसीना बहाया.

डीएमके नेता और सांसद टीकेएस इलंगोवन पूछते हैं क्या लोगों को पता है कि आरक्षण, केंद्र के साथ रिश्तों जैसे महत्वूर्ण मुद्दों पर कमल हासन की सोच क्या है?

एक विश्लेषक के मुताबिक "कमल हासन सड़क पर प्रदर्शन की राजनीति से दूर भागते हैं. पश्चिम बंगाल में देखिए कि कैसे ममता बनर्जी से वामपंथी दलों को उखाड़ फेंका. अरविंद केजरीवाल ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल किया. कमल हासन ने पिछले एक साल में एक भी प्रदर्शन का नेतृत्व नहीं किया है."

उधर फ़िल्ममेकर और एमएनएम पार्टी प्रवक्ता मुरली अब्बास कहते हैं कमल हासन और राजनीति का पुराना रिश्ता है.

उन्होंने कहा, "कमल हासन के लिए राजनीति कोई नई बात नहीं. वो सालों इसे गौर से देखते रहे हैं. जिस तरह महात्मा गांधी ने अफ़्रीका से आने के बाद राजनीति में हिस्सा लिया, कमल हासन भी गांधी की तरह हैं. जनता उन्हें जानती और उन पर विश्वास करती है."

वो कहते हैं, "ऐसे वक्त जब तमिलनाडु में उन्हें मज़बूती हासिल करनी है, वो पश्चिम बंगाल गए, ममता बनर्जी से मिले और कहा कि वो उनकी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए प्रचार करेंगे. उन्होंने आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की. उन्हें ये फ़ैसला करना होगा कि वो राज्य की राजनीति में रहना चाहते हैं या फिर सांसद और बुद्धिजीवी बनना चाहते हैं."

साल 2015 में कमल हासन ने अरविंद केजरीवाल से दिल्ली में मुलाकात की थी.

उस मुलाकात को कवर करने वाले बीबीसी तमिल के जयकुमार बताते हैं कि कमल हासन उस वक्त ही राजनीति में आने की सोच रहे थे और अरविंद केजरीवाल से पार्टी चलाने के गुर सीखना चाहते थे. उसके बाद अरविंद केजरीवाल कमल हासन से मिलने चेन्नई भी गए थे.

क्या कमल हासन के लिए वोट करेंगे फैंस?
कमल हासन के बारे में कहा जाता है कि वो पहले तमिल कलाकार हैं जिन्होंने अपने फ़ैन क्लब्स को वेलफेयर संस्थाओं में तब्दील किया.

जयकुमार कहते हैं, "ये कहना शायद सही नहीं होगा कि कमल हासन का तमिलनाडु में बेस नहीं है. तमिलनाडु की छोटी से छोटी जगह पर यहां बड़े फ़िल्मी कलाकार के फ़ैन क्लब्स होते हैं. शायद यही कारण है कि राज्य में बड़े कलाकार राजनीति की ओर कदम बढ़ाते हैं. कमल हासन का मानना था कि फैन क्लब्स के इस बेस को, इस ताकत को बड़े कटआउट् पर दूध चढ़ाने, उनका गुणगान करने की बजाए उनका इस्तेमाल सामाजिक कार्यों के लिए करना चाहिए."

Tuesday, April 9, 2019

मोदी का तंज- कांग्रेस के करीबियों के घर से बक्सों में भरे नोट निकले, असली चोर कौन

मुंबई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ महाराष्ट्र के लातूर में जनसभा की। उन्होंने मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबियों पर पड़े छापे पर निशाना साधा। मोदी ने कहा कि कांग्रेस के करीबियों के घर से बक्सों में भरे नोट बरामद हुए। इससे पता चलता है कि असली चोर कौन है? आज पहले चरण के चुनाव प्रचार का आखिरी दिन है। मोदी कर्नाटक और तमिलनाडु में भी रैली को संबोधित करेंगे।

मोदी और ठाकरे 27 महीने बाद एक मंच पर दिखाई दिए। इससे पहले उन्होंने दिसंबर 2016 में मुंबई में अरब सागर के बीच शिवाजी महाराज के स्मारक की नींव रखी थी। लातूर में चुनाव मैदान में 10 उम्मीदवार हैं लेकिन मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है। यहां 18 अप्रैल को मतदान होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा, "मध्यप्रदेश में सरकार बने अभी 6 महीने नहीं हुए, लेकिन इनकी कलाकारी देखिए, अरबों-खरबों रुपये की लूट के सबूत मिले हैं। बड़े-बड़े लोगों के बंगलों से करोड़ों का कालाधन इधर से उधर हुआ है। डर के कारण कुछ रागदरबारी, इनके खासमखास वहां पहुंच गए कि पैसे जब्त न हों और दबाव बनाने लगे। भ्रष्टाचार ही वह काम है जो कांग्रेस सत्ता में आने के बाद पूरी ईमानदारी के साथ करती है। कांग्रेस में भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार है। आपने देखा होगा कल-परसों, कैसे कांग्रेस के करीबियों के घर से बक्सों में भरे हुए नोट मिल रहे हैं। नोट से वोट खरीदने का ये पाप इनकी राजनीतिक संस्कृति रही है। ये बोलते हैं- चौकीदार चोर है, लेकिन नोट कहां से निकले। असली चोर कौन है?"

'विकास कर आपका ब्याज लौटाऊंगा'
मोदी ने कहा, "आपकी तपस्या को बेकार नहीं जाने दूंगा। विकास कर आपका ब्याज लौटाऊंगा। जो हुआ उसके लिए आपको यह चौकीदार याद आता है और जो होना चाहिए उसकी भी जिम्मेदारी मेरे ही हिस्से में है। इसी विस्तार को विश्वास देते हुए संकल्पित और सशक्त भारत रखने का संकल्प हमने देश के सामने रखा है। हम हर नागरिक की भागीदारी चाहते हैं। एक तरफ हमारी नीति और नीयत है। दूसरी तरफ हमारे विरोधियों का दोहरा रवैया है।"

"आतंकियों के अड्डे में घुसकर मारेंगे। यह नए भारत की नीति है। आतंक को हराकर ही दम लेंगे यह हमारा संकल्प है। जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रवादियों के मन में हमने नया विश्वास जगाया है। अब कश्मीर में स्थिति सामान्य करने का हमारा संकल्प हम नतीजे सामने देख रहे हैं। हमारा संकल्प है कि सीमा पर हम घुसपैठ बंद करेंगे। नक्सलियों को रोकने और आदिवासियों का विकास करने में हमने दिन-रात मेहनत की है।"

'कांग्रेस का ढकोसला पत्र पाक की भाषा बोल रहा'
मोदी के मुताबिक- जो बात कांग्रेस का ढकोसला पत्र कह रहा है वही भाषा पाकिस्तान भी बोल रहा है। कांग्रेस का कहना है कि वे कश्मीर में अराजकता फैलाने वालों से बातचीत करेंगे। पाक भी तो यही कह रहा है ताकि भारत इन्हीं बातों में उलझा रहा है। कांग्रेस ने ऐलान किया है कि देश के टुकड़े करने की बात करने वालों को खुला लाइसेंस करेंगे, देशद्रोह का कानून खत्म करेंगे। पाक भी तो यही चाहता है कि भारत का विभाजन करने वाले अपना काम करें। कांग्रेस के ढकोसला पत्र की उम्र 23 मई तक है जबकि भाजपा के संकल्प पत्र की उम्र 5 साल है।

'कांग्रेस की वजह से देश बंटा'
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "कांग्रेस अपने घोषणापत्र में हम धारा 370 नहीं हटाएंगे की बात करती है। कांग्रेस में अक्ल होती तो 1947 में देश नहीं बंटता और पाक पैदा ही नहीं होता। मैं कांग्रेस वालों से कहता हूं कि दर्पण में जाकर अपना मुंह देखो। आपको मानवाधिकार की बात करने का कोई हक नहीं है। आप कांग्रेस वालों ने बालासाहेब (बाल ठाकरे) का मतदान करने का अधिकार छीन लिया था।"

"कांग्रेस और उसके महामिलावटी साथियों की वजह से ही देश में सुरक्षा की ऐसी स्थिति बनी रही। अब तो कांग्रेस कश्मीर में अलग प्रधानमंत्री चाहने वालों के साथ खड़ी है। उन्हें शर्म आनी चाहिए। कांग्रेस से तो देश को कोई उम्मीद नहीं, लेकिन शरदराव (शरद पवार) क्या आपको यह शोभा देता है? जम्मू कश्मीर के अलग हो जाने की बात करने वाले यह वे लोग हैं जिन पर देश ने भरोसा किया था। इनके दिल में जो इच्छा दबी है, यह जो चाहते हैं वह खुलकर सामने आ रहा है। ऐसे लोग क्या कश्मीर के हालात सुधार पाएंगे। इनकी सच्चाई देश के नागरिकों को समझनी चाहिए।"

'सेना से कितने सबूत चाहिए'
मोदी ने कहा कि दुनिया में कहीं भारत के खिलाफ एक झूठ निकलता है तो ये (कांग्रेस) उसे लपककर मीडिया में जगह बनाने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस के नौजवानों और बुजुर्गों, आपको देश की सेना और वायुसेना से कितने सबूत चाहिए।

"पाक ने एयर स्ट्राइक के बाद कहा कि भारत के दो पायलट हमारे कब्जे में हैं। लेकिन शाम को ही उन्हें कहना पड़ा कि भारत का एक ही पायलट हमारे पास है। तो दूसरे पायलट का क्या हुआ, यह बच्चे-बच्चे को पता है। लेकिन अपने देश में ही जिन्हें जवानों की बात पर भरोसा नहीं है उन्हें सजा देना जरूरी है कि नहीं? अपने स्वार्थ के लिए इन्होंने देश की सुरक्षा को नजरअंदाज किया। अब जो फैसले हो रहे हैं, वो सिर्फ देश और लोगों को आगे रख कर किए जा रहे हैं। किसानों के लिए यूपी सरकार ने काम किया है।"

23 सीटों पर चुनाव लड़ रही है शिवसेना
एनडीए की आलोचना करती रही शिवसेना ने हाल ही में महाराष्ट्र में भाजपा से सीटों के बंटवारे पर समझौता किया है। भाजपा यहां 25 सीटों पर और शिवसेना 23 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। राज्य में 48 लोकसभा सीटें हैं। महाराष्ट्र में चार चरणों में 11, 18, 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा। नतीजे 23 मई को घोषित किए जाएंगे।

Monday, April 1, 2019

अमेज़न के मालिक का 'मोबाइल हैक',सऊदी अरब पर डेटा चुराने का आरोप

अमेज़न के मालिक जेफ़ बेज़ोस के निजी संदेश नेशनल एंक्वायर टैबलॉयड के पास कैसे पहुंच गए, इसको पता लगाने के लिए जेफ़ ने एक पेशेवर को तैनात किया.

इस पेशेवर इंवेस्टीगेटर ने इस मामले का कनेक्शन सऊदी अरब से जोड़ा है. उनके मुताबिक अमेज़न के मालिक जेफ़ बेज़ोस का मोबाइल हैक किया और उसमें मौजूद जानकारियों को टैबलॉयड को मुहैया कराया गया.

गेविन डी बेकर, बेज़ोस की तरफ़ से यह जांच कर रहे हैं कि आख़िर कैसे उनकी बेहद निजी जानकारियां लीक हो गईं और नेशनल एंक्वायर टेब्लॉयड को मुहैया कराई गईं.

बेज़ोस इस मामले को वॉशिंगटन पोस्ट द्वारा सउदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या की कवरेज से जोड़कर देख रहे हैं.

बीते साल 2 अक्टूबर को इस्तांबुल में सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास में ख़ाशोज्जी की हत्या हो गई थी. जिसके बाद सउदी अरब पर उनकी हत्या को लेकर आरोप लगे थे लेकिन लगभग छह महीने का वक़्त पूरा हो जाने के बावजूद सउदी अरब ने अभी तक इस संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की है.

बेज़ोस वॉशिंगटन पोस्ट के भी मालिक है. जांचकर्ता गेविन डी बेकर का कहना है कि उन्होंने जांच के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट अमरीकी अधिकारियों को सौंप दी है.

डेली बीस्ट वेबसाइट पर उन्होंने लिखा "हमारे जांचकर्ताओं और कई विशेषज्ञों ने पूरी ईमानदारी से इस मामले की जांच की है और उन्होंने पाया कि सउदी अरब ने बेज़ोस के मोबाइल का डेटा हैक किया, उससे उनकी निजी जानकारियां निकालीं."

फरवरी महीने में बेज़ोस ख़ुद नेशनल एंक्वायर की मालिकाना कंपनी अमरीकन मीडिया इंक (एएमआई) पर ब्लैकमेल करने का आरोप लगा चुके हैं. उनका कहना था कि कंपनी उन्हें लगातार डरा कर रही है कि वो उनकी निजी जानकारियां और तस्वीरें प्रकाशित कर देगी हालांकि उन्होंने इसे राजनीति से प्रेरित नहीं माना था.

नेशनल एंक्वायर ने जनवरी महीने में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें लिखा गया था कि अमेज़न के मालिक का अफ़ेयर चल रहा है. इस रिपोर्ट में कुछ तस्वीरें भी थीं और कुछ टैक्स्ट भी.

बेकर ने आरोप लगाया है कि सउदी सरकार लगातार वॉशिंगटन पोस्ट को निशाना बना रही है और इसके पीछे वजह सिर्फ़ यह है कि वॉशिंगटन पोस्ट ख़ाशोज्जी की हत्या के मामले पर सक्रिय है.

उन्होंने कहा, "कुछ अमरीकियों को ये जानकर आश्चर्य होगा कि सउदी सरकार पिछले साल अक्टूबर महीने से ही बेज़ोस को निशाना बनाए हुई है क्योंकि वॉशिंगटन पोस्ट लगातार ख़ाशोज्जी की हत्या को कवर कर रहा है."

"यह बहुत स्पष्ट है कि सउदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान वॉशिंगटन पोस्ट को अपने सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर देखते हैं."

अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि सउदी पत्रकार की हत्या प्रिंस की सहमति या आज्ञा के बिना की ही नहीं जा सकती थी. लेकिन सउदी अरब लगातार इस तरह के आरोपों का खंडन करता रहा है.

न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, वॉशिंगटन में सउदी के दूतावास से बेकर की रिपोर्ट के सिलसिले में प्रतिक्रिया देने का आग्रह किया गया था लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया है.

फरवरी महीने में सउदी के विदेश मंत्री ने कहा था कि नेशनल एंक्वायर टैब्लॉएड में बेज़ोस के संदर्भ में जो कुछ भी प्रकाशित किया गया उसका सउदी अरब से कोई लेना-देना नहीं था.

वहीं अमरीकन मीडिया इंक ने भी अभी तक बेकर के आरोपों पर किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. इससे पहले कंपनी ने कहा था कि उसने बेज़ोस के निजी जीवन की रिपोर्टिंग करने के दौरान किसी भी तरह के क़ानून का उल्लंघन नहीं किया है.