मुबश्शिर अहमद ने चावल की फसल उठाई, तो गेंहू बोने का वक़्त सिर पर था. मगर उनके खेतों में अब तक चावल की फसल खड़ी थी. उस पर पराली या भूसा बिखरा पड़ा था. क्या करते, उन्होंने खेतों में आग लगा दी.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ज़िला नारवाल के उनके उस गांव में तक़रीबन हर किसान यही तरीक़ा अपना रहा है.
"काटें नहीं तो क्या करें? वरना गेहूं की कटाई के वक़्त हसिए से हाथ कट जाते हैं."
क्या ये ठीक है और गेंहू की फसल की तैयारी के लिए पराली को ख़त्म करना ज़रूरी होता है. चावल की खेती के ज़्यादातर इलाक़े पंजाब प्रांत के गुजरांवाला डिवीज़न में आते हैं. इन तमाम इलाक़ों में आग लगाकर ही चावल के पराली को ख़त्म किया जाता है.
तो इस कारण इससे भारी मात्रा में धुआं पैदा होता है. पंजाब के कई इलाक़ों के साथ-साथ लाहौर में बड़े पैमाने पर होने वाले प्रदूषण या स्मॉग को इसकी वजह बताया जाता है.
बीते कई सालों से धुंध और धुंआ इस क़दर सामने आया है कि इसे पंजाब का पांचवां मौसम कहा जाने लगा है. ये मौसम ठंड की शुरुआत के साथ ही आता है और हज़ारों लोग इससे प्रभावित होकर अस्पताल तक पहुंच जाते हैं.
ज़िला नारवाल के इस इलाक़े से महज़ चंद किलोमीटर के फ़ासले पर सीमा के उस पार भारतीय पंजाब है. वहां भी ज़मीन उतनी ही उपजाऊ है और वहां भी किसान कृषि के यही तौर-तरीक़े अपनाते हैं.
वास्तव में भारत में चावल की खेती का इलाक़ा पाकिस्तान के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बड़ा है इसलिए वहां पराली ज़्यादा जलती है तो धुआं भी ज़्यादा उठता है. भारत में स्मॉग का मुद्दा कहीं ज़्यादा तेज़ी से उठ रहा है. स्मॉग के मौसम में भारत की राजधानी दिल्ली में सांस तक लेना मुश्किल हो जाता है.
वहां भी बड़ा दोषी चावल की पराली का धुआं है. पाकिस्तानी पर्यावरण विशेषज्ञ तो इसे पाकिस्तान का भी दोषी मानते हैं. उनका कहना है कि हवाओं के साथ सफ़र करता ये धुआं भारत से पाकिस्तान में आता है और यहां स्मॉग को और भयंकर रूप दे देता है.
इस साल लाहौर में स्मॉग का मौसम आया ही था कि बारिश हो गई. इस बार क़िस्मत अच्छी रही वरना स्मॉग पैदा करने वाले कारक मौजूद थे. दोनों देशों में सरकार कशमकश में है कि इसका हल क्या किया जाए.
भारत में चंद प्रगतिशील किसानों ने इस मुद्दे का एक हल ढूंढ निकाला है. वह बीते चंद सालों से चावल की पराली और पुआल को खाद में तब्दील कर रहे हैं. कई इलाक़ों में उनसे ऊर्जा भी पैदा की जा रही है जबकि चंद संगठन उनसे गैस बनाने की योजना भी बना रही हैं.
ये काम अधिकतर व्यक्तिगत या निजी तौर पर जारी है हालांकि एक निजी संगठन के कर्मचारी ने बीबीसी को बताया कि सरकार ने उनसे ये सीएनजी गैस ख़रीदने का वादा किया है. इस तरह दो फ़ायदे होते हैं.
वही पराली या पुआल जो पहले किसान जला देता था, अब उसके लिए क़ीमती हो जाएगी. वह उसे जलाने के बजाए बचाने की ख़ुद व्यवस्था करेगा. दूसरा इसे खाद में तब्दील करने से किसान की आर्थिक बोझ कम हो जाता है. इससे गेंहू के खेत को तक़रीबन 25 फ़ीसद कम खाद देना पड़ती है.
Monday, December 31, 2018
Thursday, December 27, 2018
कर्ज़ माफ़ीः इलाज है या बस पेन किलर? : ग्राउंड रिपोर्ट
एक किसान नेता की ये बात किसानों की समस्याओं और कर्ज़ माफी को इसका हल बताने की दलील पर ही सवाल खड़े करती है.
असम की भाजपा सरकार ने जैसे ही मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की नवगठित कांग्रेस सरकारों की देखादेखी किसानों के लिए कर्ज़ माफी का ऐलान किया, ऐसा लगा जैसे देश की राजनीति राम मंदिर की पगडंडी से आगे बढ़ते हुए खेत-खलिहानों की तरफ़ बढ़ने लगी.
पर सालों भर चुनाव नहीं होते लेकिन खेतीबारी का काम हर मौसम में चलता रहता है. यानी किसानों की परेशानियां मौसम और चुनाव देखकर नहीं आते.
और सवाल तो ये भी है कि कर्ज़ माफी से किसान के लिए क्या बदल जाता है? उसकी परेशानियों का कैंसर कर्ज माफी के पेन किलर से क्या ठीक हो जाता है?
बीबीसी ने ऐसे ही कुछ किसानों की ज़िंदगी में झांकने की कोशिश की है जिन्हें अतीत में कर्ज़ माफी मिल थी लेकिन आज वे कैसे हालात में है.
मोहन कुमार की कहानी
मोहन कुमार की आंखें विजयपुर के कच्चे रेशम के सरकारी मार्केट की दीवार पर लगे डिस्प्ले पर लगातार ठहरी हुई हैं.
मंडी के जानकारों की राय में कच्चे रेशम के ये गुच्छे जितने कड़े होते हैं, उनकी क्वॉलिटी उतनी ही अच्छी मानी जाती है. लेकिन कच्चे रेशम के भाव पर ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा.
पर तीसरे और आख़िरी राउंड में क़ीमतें अचानक परवान चढ़ने लगीं, 100 का भाव 200 से होते हुए 255 तक पहुंच गया.
और मोहन कुमार ने फ़ैसला किया कि पहले राउंड में लगी बोली से जो भी कुछ भी ज़्यादा मिलेगा, वो अपना कच्चा रेशम बेच देंगे.
बेंगलुरु ग्रामीण के देवनहल्ली तालुका के मल्लेपुरा गांव के मोहन कुमार बताते हैं, "आज मैंने 30 किलो कच्चा रेशम बेचा. कल मेरे पास 35 किलो थे. 65 किलो कच्चे रेशम की एवज में मुझे 18000 रुपये मिले. मजदूरी, खाद, कीटनाशक और दूसरे खर्चे मिलाकर मैंने 13,000 रुपये लगाए थे. बस 5,000 रुपये हाथ में बचे हैं, ऐसे में घर चलाना मुश्किल है. इस बार रागी की फसल भी बर्बाद हो गई है."
मोहन के खेत में जितनी भी रागी की फसल उपजती थी, वे उसे बेचते नहीं थे बल्कि परिवार के साल भर के इस्तेमाल के लिए रख लेते थे.
लेकिन इस बार उन्हें बाज़ार से रागी खरीदना होगा. पानी की कमी के चलते रागी की फसल ख़राब हो गई. न केवल रागी बल्कि अरहर दाल की फसल और सब्जियों की खेती का भी यही हाल हुआ.
विजयपुर से चार किलोमीटर की दूरी पर मोहन कुमार के पास साढ़े चार एकड़ का प्लॉट है जिसके दो एकड़ में ये फसलें उगाई जाती हैं. बाक़ी ज़मीन पर मोहन कुमार शहतूत के पेड़ उगाते हैं जिनसे कच्चा रेशम तैयार किया जाता है.
असम की भाजपा सरकार ने जैसे ही मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की नवगठित कांग्रेस सरकारों की देखादेखी किसानों के लिए कर्ज़ माफी का ऐलान किया, ऐसा लगा जैसे देश की राजनीति राम मंदिर की पगडंडी से आगे बढ़ते हुए खेत-खलिहानों की तरफ़ बढ़ने लगी.
पर सालों भर चुनाव नहीं होते लेकिन खेतीबारी का काम हर मौसम में चलता रहता है. यानी किसानों की परेशानियां मौसम और चुनाव देखकर नहीं आते.
और सवाल तो ये भी है कि कर्ज़ माफी से किसान के लिए क्या बदल जाता है? उसकी परेशानियों का कैंसर कर्ज माफी के पेन किलर से क्या ठीक हो जाता है?
बीबीसी ने ऐसे ही कुछ किसानों की ज़िंदगी में झांकने की कोशिश की है जिन्हें अतीत में कर्ज़ माफी मिल थी लेकिन आज वे कैसे हालात में है.
मोहन कुमार की कहानी
मोहन कुमार की आंखें विजयपुर के कच्चे रेशम के सरकारी मार्केट की दीवार पर लगे डिस्प्ले पर लगातार ठहरी हुई हैं.
मंडी के जानकारों की राय में कच्चे रेशम के ये गुच्छे जितने कड़े होते हैं, उनकी क्वॉलिटी उतनी ही अच्छी मानी जाती है. लेकिन कच्चे रेशम के भाव पर ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा.
पर तीसरे और आख़िरी राउंड में क़ीमतें अचानक परवान चढ़ने लगीं, 100 का भाव 200 से होते हुए 255 तक पहुंच गया.
और मोहन कुमार ने फ़ैसला किया कि पहले राउंड में लगी बोली से जो भी कुछ भी ज़्यादा मिलेगा, वो अपना कच्चा रेशम बेच देंगे.
बेंगलुरु ग्रामीण के देवनहल्ली तालुका के मल्लेपुरा गांव के मोहन कुमार बताते हैं, "आज मैंने 30 किलो कच्चा रेशम बेचा. कल मेरे पास 35 किलो थे. 65 किलो कच्चे रेशम की एवज में मुझे 18000 रुपये मिले. मजदूरी, खाद, कीटनाशक और दूसरे खर्चे मिलाकर मैंने 13,000 रुपये लगाए थे. बस 5,000 रुपये हाथ में बचे हैं, ऐसे में घर चलाना मुश्किल है. इस बार रागी की फसल भी बर्बाद हो गई है."
मोहन के खेत में जितनी भी रागी की फसल उपजती थी, वे उसे बेचते नहीं थे बल्कि परिवार के साल भर के इस्तेमाल के लिए रख लेते थे.
लेकिन इस बार उन्हें बाज़ार से रागी खरीदना होगा. पानी की कमी के चलते रागी की फसल ख़राब हो गई. न केवल रागी बल्कि अरहर दाल की फसल और सब्जियों की खेती का भी यही हाल हुआ.
विजयपुर से चार किलोमीटर की दूरी पर मोहन कुमार के पास साढ़े चार एकड़ का प्लॉट है जिसके दो एकड़ में ये फसलें उगाई जाती हैं. बाक़ी ज़मीन पर मोहन कुमार शहतूत के पेड़ उगाते हैं जिनसे कच्चा रेशम तैयार किया जाता है.
Monday, December 17, 2018
Oscars 2019 की रेस से बाहर हुई भारत की विलेज रॉकस्टार्स, इन फिल्मों ने पछाड़ा
विलेज रॉकस्टार्स को विदेशी भाषा श्रेणी में अगले राउंड की वोटिंग के लिए 9 फिल्मों में जगह नहीं मिली है. दी एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेस ने सोमवार को बेस्ट फ़ॉरेन कैटेगरी के लिए अगले राउंड में चुनी गई फिल्मों के नाम की घोषणा कर दी. रीमा दास विलेज रॉकस्टार्स का निर्देशन किया है.
रॉकस्टार्स को किन फिल्मों ने पछाड़ा?
बर्ड्स ऑफ;पैसेज (कोलंबिया), द गिल्टी (डेनमार्क), नेवर लुक अवे (जर्मनी), शॉपलिफ्टर्स (जापान), आयका (कजाकिस्तान), कैपरनाम (लेबनान), रोमा (मैक्सिको), कोल्ड वार (पोलैंड) और बर्निंग (साउथ कोरिया) फ़िल्में फ़ॉरेन कैटेगरी में वोटिंग के लिए अगले राउंड में पहुंची हैं. बताते चलें कि 91वें एकेडमी अवॉर्ड्स के लिए दुनियाभ र की 87 फ़िल्में इस कैटेगरी में सबमिट की गई थीं.
ऑस्कर्स में विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में शीर्ष पांच तक अब तक भारत की सिर्फ तीन ही फिल्में पहुंच पाई है, जिसमें 'मदर इंडिया', 'सलाम बॉम्बे' और 'लगान : वंस अपॉन ए टाइम इन इंडिया' है.
क्या है विलेज रॉकस्टार्स की कहानी ?
फिल्म का लेखन, निर्देशन रीमा दास ने किया है. उन्होंने अपनी फिल्म का बैकग्राउंड असम का छोटा सा गांव छायगांव रखा है. ये 10 साल की लड़की धुनू की कहानी है. जो अपनी विधवा मां के साथ रहती है. धुनू आसपास होने वाले आयोजनों में सांप बेचने में अपनी मां की मदद करती है. इसी दौरान वह एक रोज एक बैंड को परफॉर्म करते देखती है और मंत्रमुग्ध हो जाती है.
इसके बाद वह कॉमिक्स बुक पढ़ती है और तय करती है कि वह अपना एक बैंड बनाएगी, जिसमें ऑरिजनल इंस्ट्रूमेंट्स बजाए जाएंगे. धुनू गिटार खरीदने के लिए पैसे जमा करती है. इसी दौरान गांव में बाढ़ आ जाती है और धुनू की प्राथमिकताएं बदल जाती है. इसके बाद आशा और खुद पर भरोसे का गहरा सामंजस्य देखने को मिलता है. फिल्म दर्शकों को इमोशनल करती है.
सराही गई है रीमा दास की फिल्म
इस फिल्म ने 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए 'स्वर्ण कमल' का पुरस्कार जीता था. बाद में सीधे ऑस्कर्स में एंट्री मिलना कलाकारों और मेकर्स के लिए बहुत बड़ी बात है. ये फ़िल्म साल 2017 में आई थी जिसका प्रीमियर टोरंटो फ़िल्म फेस्टिवल में किया गया था. रीमा फिल्म की प्रोड्यूसर और एडिटर भी हैं.
इन फिल्मों को पछाड़कर ऑस्कर के लिए भेजी गई थी फिल्म
विलेज रॉकस्टार्स ने ऑस्कर्स के नॉमिनेशन के लिए कई बड़ी फिल्मों को पछाड़ा था, जिसमें पद्मावत, राज़ी, हिचकी, अक्टूबर, लव सोनिया, पिहू, कड़वी हवा, मैं गायत्री जाधव, बिस्कोपवाला, मंटो,102 नॉट आउट, पैडमन, अज्जी जैसी हिंदी फिल्में शामिल थीं.
रॉकस्टार्स को किन फिल्मों ने पछाड़ा?
बर्ड्स ऑफ;पैसेज (कोलंबिया), द गिल्टी (डेनमार्क), नेवर लुक अवे (जर्मनी), शॉपलिफ्टर्स (जापान), आयका (कजाकिस्तान), कैपरनाम (लेबनान), रोमा (मैक्सिको), कोल्ड वार (पोलैंड) और बर्निंग (साउथ कोरिया) फ़िल्में फ़ॉरेन कैटेगरी में वोटिंग के लिए अगले राउंड में पहुंची हैं. बताते चलें कि 91वें एकेडमी अवॉर्ड्स के लिए दुनियाभ र की 87 फ़िल्में इस कैटेगरी में सबमिट की गई थीं.
ऑस्कर्स में विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में शीर्ष पांच तक अब तक भारत की सिर्फ तीन ही फिल्में पहुंच पाई है, जिसमें 'मदर इंडिया', 'सलाम बॉम्बे' और 'लगान : वंस अपॉन ए टाइम इन इंडिया' है.
क्या है विलेज रॉकस्टार्स की कहानी ?
फिल्म का लेखन, निर्देशन रीमा दास ने किया है. उन्होंने अपनी फिल्म का बैकग्राउंड असम का छोटा सा गांव छायगांव रखा है. ये 10 साल की लड़की धुनू की कहानी है. जो अपनी विधवा मां के साथ रहती है. धुनू आसपास होने वाले आयोजनों में सांप बेचने में अपनी मां की मदद करती है. इसी दौरान वह एक रोज एक बैंड को परफॉर्म करते देखती है और मंत्रमुग्ध हो जाती है.
इसके बाद वह कॉमिक्स बुक पढ़ती है और तय करती है कि वह अपना एक बैंड बनाएगी, जिसमें ऑरिजनल इंस्ट्रूमेंट्स बजाए जाएंगे. धुनू गिटार खरीदने के लिए पैसे जमा करती है. इसी दौरान गांव में बाढ़ आ जाती है और धुनू की प्राथमिकताएं बदल जाती है. इसके बाद आशा और खुद पर भरोसे का गहरा सामंजस्य देखने को मिलता है. फिल्म दर्शकों को इमोशनल करती है.
सराही गई है रीमा दास की फिल्म
इस फिल्म ने 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए 'स्वर्ण कमल' का पुरस्कार जीता था. बाद में सीधे ऑस्कर्स में एंट्री मिलना कलाकारों और मेकर्स के लिए बहुत बड़ी बात है. ये फ़िल्म साल 2017 में आई थी जिसका प्रीमियर टोरंटो फ़िल्म फेस्टिवल में किया गया था. रीमा फिल्म की प्रोड्यूसर और एडिटर भी हैं.
इन फिल्मों को पछाड़कर ऑस्कर के लिए भेजी गई थी फिल्म
विलेज रॉकस्टार्स ने ऑस्कर्स के नॉमिनेशन के लिए कई बड़ी फिल्मों को पछाड़ा था, जिसमें पद्मावत, राज़ी, हिचकी, अक्टूबर, लव सोनिया, पिहू, कड़वी हवा, मैं गायत्री जाधव, बिस्कोपवाला, मंटो,102 नॉट आउट, पैडमन, अज्जी जैसी हिंदी फिल्में शामिल थीं.
Thursday, December 13, 2018
राफेल पर SC के फैसले से सामने आया राहुल गांधी का झूठ: अमित शाह
राफेल डील पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस डील पर कोई संदेह नहीं है और न ही इसकी गुणवत्ता पर कोई सवाल है. SC के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए राजनाथ ने कहा कि कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोप निराधार थे.
सुप्रीम कोर्ट में राफेल डील पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि डील पर कोई संदेह नहीं है. राफेल की गुणवत्ता को लेकर कोई सवाल नहीं है. हमने सौदे की पूरी प्रक्रिया पढ़ी है, विमान हमारे देश की जरूरत है. सीजेआई ने कहा कि विमान की कीमत देखना हमारा काम नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदे की जांच को लेकर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है.
सामने आया कांग्रेस अध्यक्ष का झूठ: अमित शाह
इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर कहा है, सच हमेशा जीतता है. राफेल पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राजनीतिक फायदे के लिए फैलाए जा रहे कांग्रेस अध्यक्ष के झूठ को उजागर कर दिया है. कोर्ट को इस डील में ना ही कोई खराबी दिखी है ना ही इस डील में किसी तरह का पक्षपात दिखा है.
इसके विपरीत एससी ने कहा कि ऑफसेट भागीदारों का चयन करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी. इसलिए इस सौदे को बदनाम करने वाले लोगों के मकसद पर स्पष्ट प्रश्न उठाता है, यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है.
राजनाथ बोले- कांग्रेस द्वारा लगाए आरोप निराधार
राफेल पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा- पहले से ही सब कुछ साफ था, लेकिन कांग्रेस के द्वारा बेबुनियाद आरोप लगाए गए थे. सियासी नफे के लिए जनता को गुमराह किया जा रहा था, लेकिन यह स्थिति आज पूरी तरह से साफ हो गई है कि जो भी आरोपी कांग्रेस पार्टी लगा रही थी वो निराधार थे और उनमें कोई दम नहीं था.
राजनाथ ने कहा कि जनता की आंखों में धूल झोंककर राजनीतिक क्षेत्र में भी लंबे समय तक भी कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती. हमें विश्वास है कि जो भी राफेल डील हुई है वह बहुत निष्पक्ष और ईमानदार है. इससे पहले दसॉ के सीईओ ने भी स्थिति पूरी तरह से साफ कर दी थी. मैं समझता हूं कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद दूसरी कोई कमिटी बनाने का प्रश्न नहीं उठता.
सुप्रीम कोर्ट में राफेल डील पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि डील पर कोई संदेह नहीं है. राफेल की गुणवत्ता को लेकर कोई सवाल नहीं है. हमने सौदे की पूरी प्रक्रिया पढ़ी है, विमान हमारे देश की जरूरत है. सीजेआई ने कहा कि विमान की कीमत देखना हमारा काम नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदे की जांच को लेकर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है.
सामने आया कांग्रेस अध्यक्ष का झूठ: अमित शाह
इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर कहा है, सच हमेशा जीतता है. राफेल पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राजनीतिक फायदे के लिए फैलाए जा रहे कांग्रेस अध्यक्ष के झूठ को उजागर कर दिया है. कोर्ट को इस डील में ना ही कोई खराबी दिखी है ना ही इस डील में किसी तरह का पक्षपात दिखा है.
इसके विपरीत एससी ने कहा कि ऑफसेट भागीदारों का चयन करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी. इसलिए इस सौदे को बदनाम करने वाले लोगों के मकसद पर स्पष्ट प्रश्न उठाता है, यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है.
राजनाथ बोले- कांग्रेस द्वारा लगाए आरोप निराधार
राफेल पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा- पहले से ही सब कुछ साफ था, लेकिन कांग्रेस के द्वारा बेबुनियाद आरोप लगाए गए थे. सियासी नफे के लिए जनता को गुमराह किया जा रहा था, लेकिन यह स्थिति आज पूरी तरह से साफ हो गई है कि जो भी आरोपी कांग्रेस पार्टी लगा रही थी वो निराधार थे और उनमें कोई दम नहीं था.
राजनाथ ने कहा कि जनता की आंखों में धूल झोंककर राजनीतिक क्षेत्र में भी लंबे समय तक भी कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती. हमें विश्वास है कि जो भी राफेल डील हुई है वह बहुत निष्पक्ष और ईमानदार है. इससे पहले दसॉ के सीईओ ने भी स्थिति पूरी तरह से साफ कर दी थी. मैं समझता हूं कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद दूसरी कोई कमिटी बनाने का प्रश्न नहीं उठता.
Monday, December 10, 2018
क्या संतरे से हो सकता है सर्दी का इलाज?
हिंदुस्तान में हर दूसरा व्यक्ति, वैद्य, हकीम या डॉक्टर है.
'पेट दर्द हो रहा है. थोड़ी अजवाइन फांक लो'.
'ज़ुकाम हो गया है.नींबू नमक डाल कर गुनगुना पानी ले लो.'
छोटे-मोटे मर्ज़ का इलाज यूं बताया जाता है, मानो इसमें डॉक्टरेट हासिल हो.
वैसे, ये हाल सिर्फ़ हिंदुस्तान का हो, ऐसा नहीं है. हर सभ्यता और संस्क़ति में इंसान ने हज़ारों सालों के तजुर्बे से ऐसे नुस्खे ईजाद किए हैं, जो सीज़नल बीमारियों में राहत देते हैं.
सर्दियों के दिन है. ख़ांसी, ज़ुकाम और ठंड लगने की बातें आम हैं. हों भी क्यों न. इसके लिए दुनिया भर में 200 से ज़्यादा क़िस्म के वायरस ज़िम्मेदार होते हैं. नतीजा ये कि हर देश में ठंड लगने पर अलग-अलग नुस्खे बताए जाते हैं
नुस्ख़े कितने कारगर
सवाल ये है कि क्या ये नुस्खे इतने कारगर होते हैं कि हमें ठंड और ज़ुकाम से राहत दें?
किसी भी बीमारी से निपटने के घरेलू नुस्खे के पीछे का विज्ञान हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को मज़बूत करना होता है. इसके दो पहलू होते हैं. एक तो बीमारियों से लड़ने की हमारी जन्मजात क्षमता होती है. फिर, शरीर में नये वायरस के हमले से मुक़ाबले की तैयारी होती है. ऐसे वायरस से कैसे निपटना है, ये हमारा ज़हन याद कर लेता है. तभी, हमें पूरे जीवन में सिर्फ़ एक बार चेचक की बीमारी होती है. मगर, सर्दी कई बार, कमोबेश हर साल लगती है. वजह ये कि इसके कई तरह के वायरस होते हैं. हमारा दिमाग़ इन्हें पहचानने में चकरा जाता है.
रोगों से लड़ने की हमारी ताक़त का सीधा ताल्लुक़ हमारे खान-पान और रहन-सहन से होता है.
हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम तभी कमज़ोर होती है, जब हमारे शरीर में किसी विटामिन या खनिज की कमी होती है. यही वजह है कि सर्दी लगने पर नींबू नमक डालकर गुनगुना पानी लेने की सलाह दी जाती है. क्योंकि इससे शरीर में नमक और विटामिन सी की कमी पूरी होती है.
'पेट दर्द हो रहा है. थोड़ी अजवाइन फांक लो'.
'ज़ुकाम हो गया है.नींबू नमक डाल कर गुनगुना पानी ले लो.'
छोटे-मोटे मर्ज़ का इलाज यूं बताया जाता है, मानो इसमें डॉक्टरेट हासिल हो.
वैसे, ये हाल सिर्फ़ हिंदुस्तान का हो, ऐसा नहीं है. हर सभ्यता और संस्क़ति में इंसान ने हज़ारों सालों के तजुर्बे से ऐसे नुस्खे ईजाद किए हैं, जो सीज़नल बीमारियों में राहत देते हैं.
सर्दियों के दिन है. ख़ांसी, ज़ुकाम और ठंड लगने की बातें आम हैं. हों भी क्यों न. इसके लिए दुनिया भर में 200 से ज़्यादा क़िस्म के वायरस ज़िम्मेदार होते हैं. नतीजा ये कि हर देश में ठंड लगने पर अलग-अलग नुस्खे बताए जाते हैं
नुस्ख़े कितने कारगर
सवाल ये है कि क्या ये नुस्खे इतने कारगर होते हैं कि हमें ठंड और ज़ुकाम से राहत दें?
किसी भी बीमारी से निपटने के घरेलू नुस्खे के पीछे का विज्ञान हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को मज़बूत करना होता है. इसके दो पहलू होते हैं. एक तो बीमारियों से लड़ने की हमारी जन्मजात क्षमता होती है. फिर, शरीर में नये वायरस के हमले से मुक़ाबले की तैयारी होती है. ऐसे वायरस से कैसे निपटना है, ये हमारा ज़हन याद कर लेता है. तभी, हमें पूरे जीवन में सिर्फ़ एक बार चेचक की बीमारी होती है. मगर, सर्दी कई बार, कमोबेश हर साल लगती है. वजह ये कि इसके कई तरह के वायरस होते हैं. हमारा दिमाग़ इन्हें पहचानने में चकरा जाता है.
रोगों से लड़ने की हमारी ताक़त का सीधा ताल्लुक़ हमारे खान-पान और रहन-सहन से होता है.
हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम तभी कमज़ोर होती है, जब हमारे शरीर में किसी विटामिन या खनिज की कमी होती है. यही वजह है कि सर्दी लगने पर नींबू नमक डालकर गुनगुना पानी लेने की सलाह दी जाती है. क्योंकि इससे शरीर में नमक और विटामिन सी की कमी पूरी होती है.
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