एक किसान नेता की ये बात किसानों की समस्याओं और कर्ज़ माफी को इसका हल बताने की दलील पर ही सवाल खड़े करती है.
असम की भाजपा सरकार ने जैसे ही मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की नवगठित कांग्रेस सरकारों की देखादेखी किसानों के लिए कर्ज़ माफी का ऐलान किया, ऐसा लगा जैसे देश की राजनीति राम मंदिर की पगडंडी से आगे बढ़ते हुए खेत-खलिहानों की तरफ़ बढ़ने लगी.
पर सालों भर चुनाव नहीं होते लेकिन खेतीबारी का काम हर मौसम में चलता रहता है. यानी किसानों की परेशानियां मौसम और चुनाव देखकर नहीं आते.
और सवाल तो ये भी है कि कर्ज़ माफी से किसान के लिए क्या बदल जाता है? उसकी परेशानियों का कैंसर कर्ज माफी के पेन किलर से क्या ठीक हो जाता है?
बीबीसी ने ऐसे ही कुछ किसानों की ज़िंदगी में झांकने की कोशिश की है जिन्हें अतीत में कर्ज़ माफी मिल थी लेकिन आज वे कैसे हालात में है.
मोहन कुमार की कहानी
मोहन कुमार की आंखें विजयपुर के कच्चे रेशम के सरकारी मार्केट की दीवार पर लगे डिस्प्ले पर लगातार ठहरी हुई हैं.
मंडी के जानकारों की राय में कच्चे रेशम के ये गुच्छे जितने कड़े होते हैं, उनकी क्वॉलिटी उतनी ही अच्छी मानी जाती है. लेकिन कच्चे रेशम के भाव पर ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा.
पर तीसरे और आख़िरी राउंड में क़ीमतें अचानक परवान चढ़ने लगीं, 100 का भाव 200 से होते हुए 255 तक पहुंच गया.
और मोहन कुमार ने फ़ैसला किया कि पहले राउंड में लगी बोली से जो भी कुछ भी ज़्यादा मिलेगा, वो अपना कच्चा रेशम बेच देंगे.
बेंगलुरु ग्रामीण के देवनहल्ली तालुका के मल्लेपुरा गांव के मोहन कुमार बताते हैं, "आज मैंने 30 किलो कच्चा रेशम बेचा. कल मेरे पास 35 किलो थे. 65 किलो कच्चे रेशम की एवज में मुझे 18000 रुपये मिले. मजदूरी, खाद, कीटनाशक और दूसरे खर्चे मिलाकर मैंने 13,000 रुपये लगाए थे. बस 5,000 रुपये हाथ में बचे हैं, ऐसे में घर चलाना मुश्किल है. इस बार रागी की फसल भी बर्बाद हो गई है."
मोहन के खेत में जितनी भी रागी की फसल उपजती थी, वे उसे बेचते नहीं थे बल्कि परिवार के साल भर के इस्तेमाल के लिए रख लेते थे.
लेकिन इस बार उन्हें बाज़ार से रागी खरीदना होगा. पानी की कमी के चलते रागी की फसल ख़राब हो गई. न केवल रागी बल्कि अरहर दाल की फसल और सब्जियों की खेती का भी यही हाल हुआ.
विजयपुर से चार किलोमीटर की दूरी पर मोहन कुमार के पास साढ़े चार एकड़ का प्लॉट है जिसके दो एकड़ में ये फसलें उगाई जाती हैं. बाक़ी ज़मीन पर मोहन कुमार शहतूत के पेड़ उगाते हैं जिनसे कच्चा रेशम तैयार किया जाता है.
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